अक्कड़ मक्कड़, धूल में धक्कड़, दोनों मूरख, दोनों अक्खड़, हाट से लौटे, ठाट से लौटे, एक साथ एक बाट से लौटे । बात बात में बात ठन गई, बांह उठी और मूछ तन गई, इसने उसकी गर्दन भींची उसने इसकी दाढ़ी खींची । अब वह जीता, अब यह जीता दोनों का बन चला फजीता; लोग तमाशाई जो ठहरे — सबके खिले हुए थे चेहरे ! मगर एक कोई था फक्कड़, मन का राजम कर्रा-कक्कड़; बढ़ा भीड़ को चीर-चार कर बोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर । अक्कड़ मक्कड़ धुल में धक्कड़ दोनों मूरख दोनों अक्कड़, गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा, सही बात पर झुकना पड़ा ! उसने कहा, सही वाणी में डूबो चुल्लू-भर पानी में; ताकत लड़ने में मत खोओ चलो भाई-चारे को बोओ ! खाली सब मैदान पड़ा है आफत का शैतान खड़ा है ताकत ऐसे ही मत खोओ; चलो भाई-चारे को बोओ ! सूनी मूर्खों ने जब बानी, दोनों जैसे पानी-पानी; लड़ना छोड़ा अलग हट गए, लोग शर्म से गले, छंट गए । सबको नाहक लड़ना अखरा, ताकत भूल गई सब नखरा; गले मिले तब अक्कड़ मक्कड़ ख़त्म हो गया धूल में धक्कड़