होंठ झुके जब होंठों पर.. साँस उलझी हो साँसों में .. दो जुड़वा होंठों की बात कहो आँखों से ..
भूल गये हो मुझको
हरे पेड़ की ठंडी छाँव चन्द्र सुशोभित मेरे गांव भूल गये हो मुझको पर याद तो होगा मेरा गाँव तेरे यादों के बाहर खड़े उन सब पेड़ के पत्तों पर सुबह सवेरे अब भी ओस जम तो जाती होगी सच कहना तब तुमको गांव याद तो आती होगी।
Comments
Post a Comment