ग़म की कहानी Skip to main content

होंठ झुके जब होंठों

होंठ झुके जब होंठों पर.. साँस उलझी हो साँसों में .. दो जुड़वा होंठों की बात कहो आँखों से ..

ग़म की कहानी

किसको फ़ुरसत इस महफ़िल में ग़म की कहानी पढ़ने की
सूनी कलाई देख के लेकिन चूड़ी वाला टूट गया

ये देखकर पतंगें भी हैरान हो गईं
कि अब तो छतें भी हिंदू-मुसलमान हो गईं

बस इतनी बात पर उसने हमें बलवाई लिक्खा है
हमारे घर के एक बरतन पे आईएसआई लिक्खा है

बदन में दौड़ता सारा लहू ईमान वाला है
मगर ज़ालिम समझता है कि पाकिस्तान वाला है

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है
कहीं भी शाखे-गुल देखे तो झूला डाल देती है

हुक़ूमत मुंह भराई के हुनर से ख़ूब वाक़िफ़ है
ये हर कुत्ते के आगे शाही टुकड़ा डाल देती है

भटकती रहती है हवस दिन रात सोने की दुकानों में
ग़रीबी कान छिदवाती है तिनका डाल देती है

किसी का क़द बढ़ा देना किसी के क़द को कम करना
मुझे आता नहीं ना-मोहतरम को मोहतरम कहना

चलो मिल-जुलकर वतन पर जान देते हैं
बहुत आसान है कमरे में वंदे मातरम कहना

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